मानदेय बढ़ाने की मांग पर बीसी सखियों का हल्लाबोल, विधानसभा कूच की कोशिश से मचा हड़कंप

  1. 75 हजार रुपये का सपोर्ट फंड माफ करने और 20 हजार रुपये मासिक वेतन देने की मांग, इको गार्डन में प्रदर्शन के बाद सड़क पर बैठीं महिलाएं

    लखनऊ। राजधानी के इको गार्डन में सोमवार को बीसी सखियों ने अपनी मांगों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। लंबे समय से कम आमदनी और आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहीं महिलाओं का गुस्सा उस समय फूट पड़ा, जब बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी इको गार्डन से बाहर निकलकर विधानसभा की ओर बढ़ने लगीं। पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया तो महिलाओं ने सड़क पर जाम लगा दिया। प्रदर्शनकारी सरकार से सम्मानजनक मानदेय और आर्थिक राहत की मांग कर रही हैं।

    राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत चयनित बीसी सखियों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग सुविधाओं से वंचित महिलाओं और बैंक तक पहुंचने में असमर्थ लोगों को वित्तीय सेवाएं उपलब्ध कराना उनकी जिम्मेदारी है। वे गांवों में बैंकिंग प्रतिनिधि के रूप में लोगों की मदद करती हैं, लेकिन इसके बदले मिलने वाली राशि परिवार का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

    प्रदर्शन में शामिल रवीना ने अपनी परेशानी साझा करते हुए बताया कि उनकी नियुक्ति वर्ष 2018 में बीसी सखी के रूप में हुई थी। शुरुआत में छह महीने तक चार हजार रुपये प्रतिमाह दिए गए, लेकिन इसके बाद भुगतान की व्यवस्था कमीशन आधारित कर दी गई। वर्तमान व्यवस्था में 500 रुपये के लेनदेन पर महज 96 पैसे कमीशन मिलता है। उनका कहना है कि इतनी मामूली रकम से घर का खर्च चलाना तो दूर, कई बार रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो जाता है।

    महिलाओं की एक बड़ी नाराजगी 75 हजार रुपये के सपोर्ट फंड को लेकर भी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार की ओर से दी गई इस सहायता राशि को अब चार प्रतिशत ब्याज के साथ वापस मांगा जा रहा है। उनका कहना है कि जब पर्याप्त आमदनी ही नहीं हो रही है तो कर्ज की भरपाई कैसे संभव होगी। बीसी सखियों ने सपोर्ट फंड पूरी तरह माफ करने की मांग उठाई है।

    प्रदर्शनकारी महिलाओं की प्रमुख मांग है कि उन्हें कम से कम 20 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाए, ताकि वे अपने परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकें। उनका कहना है कि महंगाई लगातार बढ़ रही है, जबकि उनकी आमदनी बेहद कम है। ऐसे हालात में काम जारी रखना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।

    महिलाओं के मुताबिक प्रदेशभर में करीब 58 हजार बीसी सखियां इस व्यवस्था से जुड़ी हैं। वे गांवों में बैंकिंग सेवाएं पहुंचाने के लिए कई तरह की परेशानियों और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करती हैं। इसके बावजूद उनके काम के अनुरूप पारिश्रमिक नहीं मिल रहा है।

    प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर महिला सशक्तीकरण के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर होने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि जब महिलाएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में योगदान दे रही हैं, तो उन्हें भी सम्मानजनक पारिश्रमिक और आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।

    फिलहाल बीसी सखियों ने अपनी मांगों को लेकर सरकार से ठोस निर्णय लेने की अपील की है। उनका कहना है कि केवल आश्वासन से अब काम नहीं चलेगा, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए जल्द प्रभावी कदम उठाने होंगे।