अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुकेगा भारत, जयशंकर ने दो टूक रखी विदेश नीति.रूस से तेल खरीद और वैश्विक संघर्षों पर विदेश मंत्री जयशंकर रखी भारत की बात
सत्ता की शान
दिल्ली । सोमवार 2 नवम्बर। नई दिल्ली। भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी दूसरे देश के दबाव या निर्देशों से तय नहीं होती। अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी और क्वाड जैसे महत्वपूर्ण मंचों पर सहयोग के बावजूद भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र फैसले लेने के लिए प्रतिबद्ध है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अटलांटा में आयोजित जी-20 विदेश मंत्रियों की बैठक और क्वाड से जुड़ी बातचीत के दौरान भारत का यही रुख सामने रखा।
जयशंकर की इस कूटनीतिक पहल को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब रूस से भारत की तेल खरीद को लेकर अमेरिका और भारत के बीच नीतिगत मतभेद सामने आते रहे हैं। भारत का कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों से जुड़े फैसले देश की जरूरतों के अनुसार लिए जाएंगे। किसी बाहरी दबाव के आधार पर राष्ट्रीय नीतियों में बदलाव नहीं किया जा सकता। अटलांटा में हुई क्वाड बैठक में भारत के साथ अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया। बैठक में जयशंकर के अलावा अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, जापान के विदेश मंत्री और आस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग भी मौजूद रहीं। इस दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा, रणनीतिक सहयोग और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर चर्चा हुई।
भारत ने इस मंच के जरिए यह संदेश भी दिया कि अमेरिका के साथ साझेदारी का अर्थ सभी मुद्दों पर सहमति नहीं है। दोनों देशों के बीच सहयोग के कई क्षेत्र हैं, लेकिन जहां भारत के हित प्रभावित होते हैं, वहां नई दिल्ली अपनी स्वतंत्र नीति अपनाने से पीछे नहीं हटेगी। आतंकवाद के मुद्दे पर भी भारत का रुख लगातार स्पष्ट रहा है। जयशंकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार दोहरा चुके हैं कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में किसी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारत का मानना है कि आतंकवाद को लेकर वैश्विक समुदाय का रवैया एक समान होना चाहिए और किसी देश के आधार पर आतंकवाद की घटनाओं को अलग-अलग नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। विदेश मंत्री ने वैश्विक संघर्षों के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उनका कहना रहा कि युद्ध और अंतरराष्ट्रीय तनाव का नुकसान केवल संघर्ष में शामिल देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और आम लोगों के जीवन पर पड़ता है। भारत की मौजूदा कूटनीति में अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत बनाए रखना, रूस के साथ पारंपरिक साझेदारी जारी रखना और चीन से जुड़े रणनीतिक मुद्दों पर अपने हितों की रक्षा करना शामिल है। ऐसे में जयशंकर के बयानों को भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। कुल मिलाकर भारत का संदेश साफ है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मित्रता और साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन देश की संप्रभुता, सुरक्षा, ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
